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लठमार होली

 होली के पहले के नवमी के दिन राधारानी के बुलावे पर नंदगांव के हुरियार बरसाना में होली खेलने जाते हैं। वहीं दशमी के दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने जाते हैं। उसके बाद नंद चौक पर होली के रसिया गायन के मध्य लठमार होली होती है।

नंदगांव के लोग रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर हाथों में लठ लेकर बरसाना पहुंचता हे । ये लोग लठ इसलिए लेते हैं ताकि खुद को बरसाने की राधिकाअों से खुद को बचा सके। वहीं बरसाने की राधिकाएं भी सोलह श्रृंगार करके तैयार रहती हैं।

कहा जाता है कि जब नंदगाव की टोलियां बरसाना आती हैं तो वहां की महिलाएं उन पर लाठियां बरसाती हैं अौर पुरुषों को उन लाठियों से बचना होता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि होली की लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती। यदि किसी को चोट लगती है तो घाव पर मिट्टी लगाकर फिर से होली खेलने लग जाते हैं। उस समय भांग अौर ठंडाई का इंतजाम होता है।

ग्वाले बरसाने या नंदगांव में होली खेलने ऐसे ही नहीं जाते। उन्हें होली खेलने के लिए निमंत्रण दिया जाता है। बरसाने की हुरियारिन परंमपरागत तरीके से नंदगांव में कान्हा से होली खेलने के लिए हांडी में गुलाल, इत्र, मठरी, पुआ आदि मिठाई लेकर निमंत्रण देने जाती हैं। वहां उनका निमंत्रण स्वीकार करते हुए समाज के अन्य लोगों को बताया जाता है। बरसाने में लठमार होली से पूर्व शाम को लड्डूअा होली खेली जाती है। मंदिर में लोग एकत्रित होकर रसिया गाकर एक दूसरे को लड्डू मारते हैं। नंदगाव के लोग निमंत्रण स्वीकार कर यहां पंडा लाते हैं। ये सूचना जब लोगों को लगती है तो सभी नाच-गाकर एकत्रित होते हैं। लोग छतों पर खड़े होकर लड्डूअों की बरसात करते हैं। 

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