The 10 names of ganesha in Hindi

Chant these 10 names of Ganesha daily and you will soon see troubles removed from your life. It is also believed that the chanting of the names helps in changing bad luck to good luck. The ten names of Ganesha are:

गणाधिपाय नम
उमापुत्राय नम
विघ्ननाशनाय नम :
विनायकाय नम:
ईशपुत्राय नम
सर्वसिद्धिप्रदाय नम:
एकदंताय नम:
 इभवक्ताय नम:
मूषकवाहनाय नम:
कुमारगुरवे नम:

महालक्ष्मी मंत्र

महालक्ष्मी मंत्र देवी लक्ष्मी को समर्पित हे।  इस मंत्र का जप करने से धन की प्राप्ति होता हे।  धन प्राप्ति केलिए इस मंत्र के साथ साथ महालक्ष्मी की चित्र पर कमल गट्टे चढ़ाएं। लक्ष्मी को खीर की भोग देना चाहिए।

इस मंत्र का जप सुबह और श्याम १० ८ बार -  ११ दिन केलिए करना चाहिये।

महालक्ष्मी मंत्र

ऊँ श्रीं ह्यीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्यीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मये नम:।

शनि महामंत्र

शनि महामंत्र शनि देव को समर्पित हे।  इस मंत्र का जप करने से शनि देव का प्रकोप शांत होगा।  शनि देव स्थायित्व के कारक माने गए हैं।

इस मंत्र का जप सुबह और श्याम १० ८ बार -  ११ दिन केलिए करना चाहिये।

उड़द, तिल, गुड़ से बने पकवान का प्रसाद चढ़ाना महत्व पूर्ण हे।

शनि महामंत्र
ऊँ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम्। छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।।
शनि महामंत्र और हवन 

शनि देव का अभिषेक पंचामृत से करें। हवन के लिए घर के आंगन में यज्ञ कुण्ड बनाएं अथवा किसी लोहे या तांबे के पात्र में आम की लकड़ियां, गोबर के कण्डे जलाकर तिल, शक्कर, घी, चावल मिलाकर 108 बार शनि महामंत्र का उच्चारण करें और आहुति दें। 

अक्षय तृतीया पूजा

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र, गंगा या अन्य पुण्य नदी या तीर्थ में स्नान करें। इसके बाद भगवान गणेश, विष्णु , कुबेर और लक्ष्मी की  विधि विधान से पूजा करें।

नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित करें।

इसके बाद फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि गरीब लोगों को  दान करे ।

इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करें।

राशि और रंग - कोनसे राशि को कोनसा रंग लाता हे भाग्य

राशि के अनुसार रंगों का चयन करने से अपने स्वामी ग्रह को अपने अनुकूल किया जा सकता है। जिससे जीवन में सफलता के क्षितिज छुए जा सकते हैं। रंगों का प्रभाव हमारे ग्रहों पर भी पड़ता है और उससे हमारे दैनिक कार्य प्रभावित होते हैं। सही रंग का चुनाव करें तो हम निश्चित तौर पर अच्छे फल प्राप् कर सकते हैं। 

मेष  राशि का रंग 

मेष राशि के जातको के लिए लाल, सफेद, गुलाबी तथा हल्का पीला रंग शुभ होता है।

वृषभ राशि का रंग 

वृषभ राशि के जातको के लिए सफेद, हरा तथा काला रंग शुभ होता है।

मिथुन राशि का रंग 

मिथुन राशि के जातको के लिए हरा एवं सफेद रंग शुभ होता है।

कर्क राशि का रंग 

कर्क राशि के जातको के लिए सफेद, पीला, लाल रंग शुभ होता है।

सिंह राशि का रंग 

सिंह  राशि के जातको के लिए लाल, गुलाबी, हल्का पीला रंग शुभ होता है।

कन्या राशि का रंग 

कन्या  राशि के जातको के लिए हरा एवं सफेद रंग शुभ होता है।

तुला राशि का रंग 

तुला राशि के जातको के लिए सफेद, हल्का नीला, काला रंग शुभ होता है।

वृश्चिक राशि का रंग 

वृश्चिक राशि के जातको के लिए वृश्चिक लाल, पीला तथा सफेद रंग शुभ होता है।

धनु राशि का रंग 

धनु  राशि के जातको के लिए पीला, लाल, गुलाबी, जामुनी रंग शुभ होता है।

मकर राशि का रंग 

मकर  राशि के जातको के लिए काला, नीला तथा सफेद रंग शुभ होता है।

कुंभ राशि का रंग 

कुंभ राशि के जातको के लिए काला, सलेटी, नीला, सफेद रंग शुभ होता है।

मीन राशि का रंग 

मीन राशि के जातको के लिए पीला, गुलाबी, लाल तथा सफेद रंग शुभ होता है। 

आज अप्रैल २०, २०१७ का तिथि - राशि - शुभ मुहूर्त

हिन्दू पंचांग और कैलेंडर के हिसाब से आज गुरुवारअप्रैल २०२०१७ का तिथि कृष्णा पक्ष नवमी तिथि हे  वैशाख महीना कृष्णा पक्ष नवमी तिथि - ये कैलेंडर सिर्फ  उत्तर प्रदेशमध्य प्रदेशराजस्थानदिल्लीहरयाणापंजाबहिमाचल प्रदेशजम्मू एंड कश्मीरउत्तराखंडबिहारऔर झारखण्ड में लागू हे।

विक्रम सांवत - २०७४ 

काली युग - ५११९ 

तिथि - अप्रैल २० को पूरे दिन और अप्रैल २१ के १२:१० am तक तक कृष्णा पक्ष नवमी तिथि हे | उसके बाद कृष्णा पक्ष दशमी तिथि हे 

शुभ मुहूर्त - अप्रैल २०२०१७ का पूरा दिन शुभ हे।  

राशि - मकर राशि हे। 

नक्षत्रा - श्रवण नक्षत्र अप्रैल २० को ९:३९ pm तक।  उसके बाद धनिष्ठा नक्षत्र अप्रैल २१ को १०:२५ pm तक।

व्रत - 

योग - साध्य (अच्छा) १:४८ pm तक।  . उसके बाद शुभा  (अच्छा

करना - कौलव (अच्छा) ४:० ७ am तक।  उसके बाद तैतिल (अच्छा) ४:३६ pm तक।  उसके बाद गरजा (अच्छा)

अक्षय तृतीया २०१७ - अप्रैल २८ या अप्रैल २९? - अक्षय तृतीया का महत्व

२०१७ में अक्षय तृतीया दो दिन मनाई जाएगी।  महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य पश्चिम क्षेत्रों में अप्रैल २८ और उत्तर प्रदेशमध्य प्रदेशराजस्थानदिल्लीहरयाणापंजाबहिमाचल प्रदेशजम्मू एंड कश्मीरउत्तराखंडबिहारऔर झारखण्ड में अप्रैल २९ को मनाया जायेगा।  

अक्षय तृतीया तिथि 
28 अप्रैल को सूर्योदय से द्वितीया तिथि रहेगी, लेकिन दोपहर 1:30 बजे से तृतीया तिथि का प्रवेश हो जाएगा। जिससे कई लोग इस दिन भी अक्षय तृतीया मान सकते हैं।

वहीं 29 अप्रैल को सूर्योदय से तृतीया तिथि रहेगी, जो पूरे दिन मान्य होगी। इस दिन पूर्ण अक्षय तृतीया का मुहुर्त होगा।

अक्षय तृतीया और कुबेर 

अक्षय तृतीया के दिन माना जाता है कि धन के देवता कुबेर ने मां लक्ष्मी को प्रसन्न किया था और उनकी आराधना से उन्हें बहुत सारे धन भी मिला था। 

तभी से इस दिन सोना खरीदकर मां लक्ष्मी की विशेष पूजा आराधना की जाती है।

अक्षय तृतीया का महत्व

अक्षय तृतीया दिन का मुहूर्त इतना अच्छा माना जाता है कि सभी ग्रहों इस दिन अच्छे होते हैं और जिन युवा -युवतियों का विवाह न हो रहा हो अक्षय तृतीया के दिन बिना कुछ देखें उनका विवाह कर दिया जाता है।

अक्षय तृतीया का सर्व सिद्ध मुहूर्त के रूप में विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी, घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी की जा सकती है।

इस दिन नवीन वस्त्र, आभूषण धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उद्घाटन श्रेष्ठ माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है।


भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है।

आज अप्रैल १९ , २०१७ का तिथि - राशि - शुभ मुहूर्त

हिन्दू पंचांग और कैलेंडर के हिसाब से आज बुधवार, अप्रैल १९, २०१७ का तिथि कृष्णा पक्ष अष्टमी तिथि हे । वैशख महीना कृष्णा पक्ष अष्टमी तिथि - ये कैलेंडर सिर्फ  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरयाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एंड कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार, और झारखण्ड में लागू हे।

तिथि - अप्रैल १९ को ११:३५ pm तक कृष्णा पक्ष अष्टमी तिथि हे | उसके बाद कृष्णा पक्ष नवमी तिथि हे  ये रहेगी अप्रैल २० को पूरे दिन और अप्रैल २१ के १२:१० am तक.

शुभ मुहूर्त - अप्रैल १९, २०१७ का पूरा दिन शुभ हे।  

राशि - १:०७ am तक धनु राशि हे उसके बाद मकर राशि हे। 

नक्षत्रा - उत्तराषाढ़ा अप्रैल १९ को ८:२३ pm तक।  उसके बाद श्रवण नक्षत्र अप्रैल २० ९:३९ pm तक।

व्रत - कालाष्टमी।  बुधाष्टमी पर्व।

योग - सिद्धा (अच्छा) १:५२ pm तक।  . उसके बाद साध्य (अच्छा

करना - बवा (अच्छा) :३७ am तक।  उसके बाद बलवा  (अच्छा) ३:२७ pm तक।  उसके बाद कौलव (अच्छा)


राहु काल - १२:२६ pm से :०१ pm तक 

कुंडली में शनि दोष की समस्या दूर करे हनुमान की पूजा से

सिर्फ हनुमानजी को याद करने से ही शांति  मिलती हे।  हनुमान पूजा कुंडली में शनि की समस्या दूर करते हे। शनिवार को हनुमान मंदिर में पूजा करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती हे।  

यदि कुंडली में शनि दोष हे और शनि कोई समस्या खड़ी करते हैं और सभी पूजा-पाठ के बाद कोई समाधान नहीं निकलता तो  शनिवार को हनुमान को चोला चढ़ाए। 

इसके साथ ही सिंदूर और चमेली का तेल चढ़कार हनुमान चालीसा या हनुमान जी के अन्य मंत्रों का जाप करें।  

तिल के तेल का दीपक जलाएं। 

काले चने और गुड़ के साथ नारियल चढ़ाना अत्यंद लाभदायक हे।  

शनि बाधा से बचने के लिए हनुमान के 108 नामों का स्मरण करें।  

आमलकी एकादशी का महत्व - आमलकी एकादशी व्रत कथा

जो मनुष्य आमलकी एकादशी व्रत का पालन करते हैं वह निश्चित ही विष्णुलोक की प्राप्ति कर लेते हैं।आमलकी एकादशी का महत्व ब्रह्माण्ड पुराण में मान्धाता अौर वशिष्ठ संवाद में पाया हे। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष को ये व्रत का पालन करता हे। व्रत का  पालन करने से वास्तविक कल्याण की प्राप्ति होता हे।ये व्रत समस्त प्रकार के मंगल को देने वाली है। यह व्रत बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाला, एक हजार गाय दान के पुण्य का फल देने वाला एवं मोक्ष प्रदाता है। 

आमलकी एकादशी व्रत कथा 

पुराने समय के वैदिश नाम के नगर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र वर्ण के लोग बड़े ही सुखपूर्वक निवास करते थे। वहां के लोग स्वाभाविक रूप से स्वस्थ तथा ह्वष्ट-पुष्ट थे। उस नगर में कोई भी मनुष्य, पापात्मा अथवा नास्तिक नहीं था। इस नगर में जहां तहां वैदिक कर्म का अनुष्ठान हुआ करता था। वेद ध्वनि से यह नगर गूंजता ही रहता था। 

उस नगर में चंद्रवंशी राजा राज करते थे। इसी चंद्रवंशीय राजवंश में एक चैत्ररथ नाम के धर्मात्मा एवं सदाचारा राजा ने जन्म लिया। यह राजा बड़ा पराक्रमी, शूरवीर, धनवान, भाग्यवान तथा शास्त्रज्ञ भी था। इस राजा के राज्य में प्रजा को बड़ा ही सुख था। सारा वातावरण ही अनुकूल था। यहां की सारी प्रजा विष्णु भक्ति परायण थी। सभी लोग एकादशी का व्रत करते थे। इस राज्य में कोई भी दरिद्र अथवा कृपण नहीं देखा जाता था। इस प्रकार प्रजा के साथ राजा, अनेकों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते रहे। 

एक बार फाल्गुन शुक्लपक्षीय द्वादशी संयुक्ता आमलकी एकादशी आ गई। यह एकादशी महाफल देने वाली है, ऐसा जानकर नगर के बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री व पुरुष तथा स्वयं राजा ने भी सपरिवार इस एकादशी व्रत का पूरे नियमों के साथ पालन किया। 

एकादशी वाले दिन राजा प्रात: काल नदी में स्नान आदि समाप्त कर समस्त प्रजा के साथ उसी नदी के किनारे पर बने भगवान श्री विष्णु के मंदिर में जा पहुंचे। उन्होंने वहां दिव्य गंध सुवासित जलपूर्ण कलश छत्र, वस्त्र, पादुका आदि पंचरत्मों के द्वारा सुसज्जित करके भगवान की स्थापना की। इसके बाद धूप-दीप प्रज्वलित करके आमलकी अर्थात आंवले के साथ भगवान श्रीपरशुराम जी की पूजा की अौर अंत में प्रार्थना की हे परशुराम! हे रेणुका के सुखवर्धक! हे मुक्ति प्रदाता! अापको नमस्कार है। हे आमलकी! हे ब्रह्मपुत्री! हे धात्री! हे पापनिशानी! आप को नमस्कार। आप मेरी पूजा स्वीकार करें। इस प्रकार राजा ने अपनी प्रजा के व्यक्तियों के साथ भगवान श्रीविष्णु एवं भगवान श्रीपरशुराम जी की पवित्र चरित्र गाथा श्रवण, कीर्तन व स्मरण करते हुए तथा एकादशी की महिमा सुनते हुए रात्रि जागरण भी किया। 

उसी शाम एक शिकारी शिकार करता हुआ वहीं आ पहुंचा। जीवों को हत्या करके ही वह दिन व्यतीत करता था। दीपमालाअों से सुसज्जित तथा बहुत से लोगों द्वारा इकट्ठे होकर हरि कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करते देख कर शिकारी सोचने लगा कि यह सब क्या हो रहा है? शिकारी के पिछले जन्म के पुण्य का उदय होने पर ही वहां एकादशी व्रत करते हुए भक्त जनों का उसने दर्शन किया। कलश के ऊपर विराजमान भगवान श्रीदामोदर जी का उसने दर्शन किया तथा वहां बैठकर भगवान श्रीहरि की चरित्र गाथा श्रवण करने लगा। भूखा प्यासा होने पर भी एकाग्र मन से एकादशी व्रत के महात्म्य की कथा तथा भगवान श्रीहरि की महिमा श्रवण करते हुए उसने भी रात्रि जागरण किया। प्रात: होने पर राजा अपनी प्रजा के साथ अपने नगर को चला गया तथा शिकारी भी अपने घर वापस आ गया अौर समय पर उसने भोजन किया। 

कुछ समय बाद जब उस शिकारी की मृत्यु हो गई तो अनायास एकादशी व्रत पालन करने तथा एकादशी तिथि में रात्रि जागरण करने के प्रभाव से उस शिकारी ने दूसरे जन्म में विशाल धन संपदा, सेना, सामंत, हाथी, घोड़े, रथों से पूर्ण जयंती नाम की नगरी के विदूरथ नामक राजा के यहां पुत्र के रूप में जन्म लिया। वह सूर्य के समान पराक्रमी, पृथ्वी के समान क्षमाशील, धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ एवं अनेकों सद्गुणों से युक्त होकर भगवान विष्णु की भक्ति करता हुआ तथा एक लाख गांवों का आध्पत्य करता हुआ जीवन बिताने लगा। वह बड़ा दानी भी था। इस जन्म में इसका नाम वसुरथ था। 

एक बार वह शिकार करने के लिए वन में गया अौर मार्ग भटक गया। वन में घूमते-घूमते थका हारा, प्यास से व्याकुल होकर अपनी बाहों का तकिया बनाकर जंगल में सो गया। उसी समय पर्वतों मे रहने वाले मलेच्छ यवन सोए हुए राजा के पास आकर, राजा की हत्या की चेष्टा करने लगे। वे राजा को शत्रु मानकर उनकी हत्या करने पर तुले थे। उन्हें कुछ ऐसा भ्रम हो गया था कि ये वहीं व्यक्ति है जिसने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि को मारा था तथा इसी के कारण हम जंगल में खाक छान रहे हैं। किंतु आश्चर्य की बात कि उन लोगों द्वारा फेंके गए अस्त्रशस्त्र राजा को न लगकर उसके इर्द-गिर्द ही गिरते गए। राजा को खरोंच तक नहीं आई। जब उन लोगों के अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गए तो वे सभी भयभीत हो गए तथा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सके। तब सभी ने देखा कि उसी समय राजा के शरीर से दिव्य गंध युक्त, अनेकों आभूषणों से आभूष्त एक परम सुंदरी देवी प्रकट हुई। वह भीषण भृकुटीयुक्ता, क्रोधितनेत्रा देवी क्रोध से लाल-पीली हो रही थी। उस देवी का यह स्वरूप देखकर सभी यवन इधर-उधर दौड़ने लगे परंतु उस देवी ने हाथ में चक्र लेकर एक क्षण में ही सभी मलेच्छों का वध कर डाला। 

जब राजा की नींद खुली तथा उसने यह भयानक हत्याकांड देखा तो वह आश्चर्यचकित हो गया। साथ ही भयभीत भी हो गया। उन भीषण आकार वाले मलेच्छों को मरा देखकर राजा विस्मय के साथ सोचने लगा कि मेरे इन शत्रुअों को मार कर मेरी रक्षा किसने की?  यहां मेरा ऐसा कौन हितैषी मित्र है? जो भी हो, मैं उसके इस महान कार्य के लिए उसका बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापन करता हूं। उसी समय आकाशवाणी हुई कि भगवान केशव को छोड़कर भला शरणागत की रक्षा करने वाला अौर है ही कौन? अत: शरणागत रक्षक, शरणागत पालक श्रीहरि ने ही तुम्हारी रक्षा की है। राजा उस आकाशवाणी को सुनकर प्रसन्न तो हुआ ही, साथ ही भगवान श्रीहरि के चरणों में अति कृतज्ञ होकर भगवान का भजन करते हुए अपने राज्य में वापस आ गया अौर निष्टंक राज्य करने लगा। 

होलाष्टक - हिन्दू धर्म में होलाष्टक का महत्व

हिन्दू धर्म में होलाष्टक फाल्गुन अष्टमी को शुरू हो के फाल्गुन पूर्णिमा को समाप्त होता है। होलाष्टक का महत्व शिवा और तांत्रिक पूजा से जुड़ा हे।  होलाष्टक की अवधी में समस्त मांगलिक कार्य निषेध बताऐ गए हैं।

शास्त्रों में होलिका दहन के महत्वपूर्ण दिन को दारुण रात्रि कहा गया है। दारुण रात्रि की तुलना महारात्रि अर्थात महाशिवरात्रि, मोहरात्रि अर्थात कृष्णजन्माष्टमी, महानिशा अर्थात दिवाली से की जा सकती है।

होलाष्टक का कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार कामदेव द्वारा भगवान शंकर की तपस्या भंग करने पर महादेव ने फाल्गुन अष्टमी पर ही उन्हें भस्म कर दिया था।  तब रति देवी ने कामदेव के पुर्नजीवन हेतु कठिन तप किया फलस्वरुप शिव जी ने इसी पूर्णिमा पर कामदेव को नया जीवन दिया तब सम्पूर्ण सृष्टि में आनन्द मनाया गया।

ज्योतिषशास्त्र में होलाष्टक 

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार होलिकाष्टक का काल होली से पहले अष्टमी तिथि से प्रारंभ होता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से होली समस्त काम्य अनुष्ठानों हेतु श्रेष्ठ है। अष्टमी तिथि को चंद्र, नवमी तिथि को सूर्य, दशमी तिथि को शनि, एकादशी तिथि को शुक्र, द्वादशी तिथि को गुरू, त्रयोदशी तिथि को बुध, चतुर्दशी को मंगल व पूर्णीमा तिथि को राहु उग्र हो जाते हैं, जो व्यक्ति के शारिरीक व मानसिक क्षमता को प्रभावित करते हैं साथ ही निर्णय व कार्य क्षमता को कमजोर करते हैं।

होलाष्टक और तांत्रिक पूजा 

होलाष्टक की समयावधि को तांत्रिक सिद्ध मानते हैं। तंत्रसार अनुसार इन दिनों में तंत्र व मंत्र की साधना पूर्ण फल देने वाली है।

होलिकादहन से पूर्व की पूर्णिमा को प्रात: से रात्रि 12 बजे तक तांत्रिक विभिन्न प्रकार के तंत्र-मंत्रों को सिद्ध करने का कार्य करते हैं। तांत्रिक प्रक्रिया में वनस्पति संबंधित सामग्री का उपयोग पर उतारा आदि करते हैं। 

तंत्रसार अनुसार होलिकादहन की रात्री पर श्मशान की राख को अनिष्टकारी कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। 

मान्यतानुसार होलिका दहन के समय उसकी उठती हुई लौ की दिशा से कई संकेत मिलते हैं। पूर्व की ओर लौ उठना कल्याणकारी होता है, दक्षिण की ओर लौ उठना पशु पीड़ा देता है, पश्चिम की ओर लौ उठना सामान्य व उत्तर की ओर लौ उठने से बारिश होने की संभावना रहती है।

घर में आईने का स्थान - वास्तु के हिसाब से आईने का स्थान

क्या आपने अपने शयन कक्ष में आईने के स्थान पर ध्यान दिया है? घर में आईने का स्थान का महत्तव और वास्तु के हिसाब से आईने का स्थान क्या है

पलंग के बगल में आईने के संबंध में भ्रम 
पलंग के बगल में ड्रैसिंग टेबल रखने तथा शयनकक्ष में आईनों को लगाने के उपयुक्त स्थान को लेकर कई तरह के भ्रम प्रचलित हैं। इन भ्रांतियों को महा वास्तु के दृष्टिकोण से दूर किया जा सकता है।  

बैडरूम में किसी भी चीज जैसे कि आईने, ड्रैसिंग टेबल आदि को रखने का सही स्थान घर के विभिन्न हिस्सों के संतुलन के आकलन के बाद ही तय किया जा सकता है। 

शयनकक्ष में मौजूद आईना वहां सोने वाले लोगों के अवचेतन मस्तिष्क को प्रभावित करता है। किसी कमरे में आईने का स्थान तथा ऊर्जा का संतुलन वहां रहने वाले लोगों के जीवन पर सकारात्मक या नकारात्मक असर डाल सकता है। शयनकक्ष में भी ऐसा ही होता है।

आईने पर पलंग का प्रतिबिम्ब
पहले माना जाता था कि आईने या ड्रैसिंग टेबल में पलंग का प्रतिबिम्ब पडऩा बैडरूम में रहने वालों के स्वास्थ्य पर खराब प्रभाव डालता है। हालांकि, किसी भी आईने का असर इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस दिशा में लगाया गया है। साथ ही कमरे के संबंधित हिस्से में मौजूद विभिन्न तत्वों के प्रभाव का भी इसमें योगदान होता है।

कौन-सी दिशाओं में आईना लगाना हानिकारक है
दक्षिण-पूर्व दिशा : 
बैडरूम की दक्षिण-पूर्व दिशा में लगाया आईना वहां सोने वाले लोगों की सेहत पर विपरीत असर करता है। यह दिशा अग्नि का क्षेत्र है और यहां आईना अर्थात जल तत्व रखने से असंतुलन पैदा होता है। इस स्थिति को दुरुस्त करने के लिए वास्तु उपाय एवं संतुलन विधियां अपनाई जा सकती हैं।

दक्षिण-दक्षिण पश्चिम दिशा: 
इस दिशा में रखे ड्रैसिंग टेबल का भी नकारात्मक प्रभाव होता है क्योंकि यह निपटान का क्षेत्र है। इस बैडरूम को इस्तेमाल करने वालों को खूब बर्बादी तथा बांझपन का सामना भी करना पड़ सकता है। ऐसा हो तो आईने या ड्रैसिंग टेबल की दिशा बदलने का सुझाव दिया जाता है। वहां पर रंगों से संतुलन पैदा करके सौहार्द पैदा करने के लिए पौधे आदि का प्रयोग किया जा सकता है। 

दक्षिण-पश्चिम दिशा: 

यहां ड्रैसिंग टेबल रखने से बैडरूम में रहने वालों के आपसी रिश्तों में कड़वाहट पैदा होती है। दम्पत्ति एक-दूसरे से ज्यादा अपेक्षाएं रखने लगते हैं और उनमें अक्सर झगड़े तथा अनबन रहने लगती है। इस वजह से बैडरूम में दक्षिण-पश्चिम दिशा भी आईनों के लिए उपयुक्त नहीं है।